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	<title>Latest News &#8211; द फार्मासिस्ट</title>
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	<description>फार्मेसी, स्वास्थ्य और जनहित की विश्वसनीय ख़बरे</description>
	<lastBuildDate>Mon, 28 Sep 2026 02:11:44 +0000</lastBuildDate>
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		<title>सीएमएस एवं ईडी की भारत में कानूनी वैधता का पूरा सच: सर्वोच्च न्यायालय से 2026 के ताज़ा हाईकोर्ट फैसलों तक क्या अधिकार है, क्या नहीं?</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Rajnesh Kushwaha]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 27 Sep 2026 13:23:48 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Latest News]]></category>
		<category><![CDATA[CMS & ED कानून]]></category>
		<category><![CDATA[CMS & ED कानूनी स्थिति 2026]]></category>
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					<description><![CDATA[क्या CMS &#038; ED भारत में कानूनी है? क्या CMS &#038; ED धारक प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं और आवश्यक दवाओं से संबंधित कार्य कर सकते हैं? इस विस्तृत लेख में सुप्रीम कोर्ट के सुभाषिस बक्शी और डॉ. मुख्तियार चंद फैसलों से लेकर 2026 के ताजा हाईकोर्ट मामलों, उत्तर प्रदेश के सरकारी चिकित्सा स्थापना पंजीकरण और अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेजों के आधार पर CMS &#038; ED की वास्तविक कानूनी स्थिति समझिए।]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<div>
<p><strong>लेख प्रकार: विस्तृत कानूनी एवं दस्तावेज़-आधारित विश्लेषण</strong><br />
<strong>आधार: सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय, विभिन्न उच्च न्यायालयों के निर्णय, सरकारी दस्तावेज, चिकित्सकीय स्थापना पंजीकरण अभिलेख तथा उपलब्ध सीएमएस एवं ईडी संबंधी दस्तावेज</strong></p>
<h3>लेखक के बारे में</h3>
<p><strong>Dr. Rajnesh </strong>स्वास्थ्य एवं पुनर्वास क्षेत्र से जुड़े पेशेवर हैं। उन्होंने <strong>BPT , MPT (Orthopaedics), D.Pharm और LLB </strong>सहित विभिन्न स्वास्थ्य संबंधी शैक्षणिक योग्यताएँ प्राप्त की हैं। वे स्वास्थ्य जागरूकता, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं, फार्मेसी एवं फिजियोथेरेपी से जुड़े विषयों पर लेखन एवं जन-जागरूकता का कार्य करते हैं।</p>
<p>CMS &amp; ED की कानूनी स्थिति से संबंधित इस लेख में उन्होंने उपलब्ध <strong>न्यायिक निर्णयों, सरकारी दस्तावेजों, पंजीकरण संबंधी अभिलेखों तथा लागू कानूनी प्रावधानों</strong> का अध्ययन करके विषय को सामान्य पाठकों के लिए सरल भाषा में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है।</p>
<p><strong>नोट:</strong> लेखक द्वारा प्रस्तुत सामग्री सामान्य जानकारी एवं जागरूकता के उद्देश्य से है। यह व्यक्तिगत कानूनी सलाह या किसी व्यक्ति के लिए चिकित्सा-प्रैक्टिस की अनुमति का प्रमाण नहीं है।</p>
<p>भारत में <strong>सीएमएस एवं ईडी अर्थात कम्युनिटी मेडिकल सर्विस एंड एसेंशियल ड्रग्स</strong> को लेकर लंबे समय से भ्रम की स्थिति बनी हुई है। एक तरफ अनेक संस्थाएं और व्यक्ति इसे ग्रामीण एवं प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी योग्यता बताते हैं, दूसरी तरफ कुछ स्थानों पर इसी योग्यता के आधार पर चिकित्सा सेवाएं देने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध कार्रवाई, प्राथमिकी और न्यायालयीन विवाद भी सामने आए हैं।</p>
<p>समस्या का सबसे बड़ा कारण यह है कि अलग-अलग स्तर की तीन अलग-अलग बातों को अक्सर एक ही मान लिया जाता है—</p>
<ol start="1">
<li><strong>सीएमएस एवं ईडी पाठ्यक्रम या प्रमाणपत्र</strong>,</li>
<li><strong>किसी परिषद या संस्था द्वारा दिया गया पंजीकरण</strong>, और</li>
<li><strong>किसी राज्य के कानून के अंतर्गत चिकित्सा सेवा देने का वैधानिक अधिकार।</strong></li>
</ol>
<p>इन तीनों को अलग-अलग समझे बिना सीएमएस एवं ईडी की कानूनी स्थिति पर कोई सटीक निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है।</p>
<p>इस विषय में सबसे अधिक उद्धृत निर्णय <strong>सुभाषिस बक्शी बनाम पश्चिम बंगाल मेडिकल काउंसिल</strong> का सर्वोच्च न्यायालय का 14 फरवरी 2003 का फैसला है। उस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल की एक विशिष्ट वैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत सामुदायिक चिकित्सा सेवा के डिप्लोमा धारकों के उपचार तथा औषधि लिखने से संबंधित अधिकारों की चर्चा की और उपचार के अधिकार से औषधि लिखने के अधिकार को अलग नहीं माना।</p>
<p>लेकिन इस फैसले को पढ़ते समय एक बात अत्यंत महत्वपूर्ण है: <strong>वह निर्णय पश्चिम बंगाल की विशिष्ट सरकारी एवं वैधानिक व्यवस्था पर आधारित था।</strong> इसलिए उसे भारत के प्रत्येक सीएमएस एवं ईडी प्रमाणपत्रधारी के लिए स्वतः अखिल भारतीय चिकित्सकीय लाइसेंस मानना कानूनी रूप से सही नहीं होगा।</p>
<p>इसी प्रकार यह कहना भी उतना ही गलत होगा कि भारत में सीएमएस एवं ईडी नाम का प्रत्येक प्रमाणपत्र अपने-आप “अवैध” है। न्यायालयों में सामने आए मामलों का अध्ययन बताता है कि वास्तविक प्रश्न हमेशा यह होता है कि <strong>किस संस्था ने प्रमाणपत्र दिया, उस संस्था की वैधानिक स्थिति क्या है, संबंधित व्यक्ति किस राज्य में पंजीकृत है, राज्य का कानून क्या कहता है, किस प्रकार की चिकित्सा सेवा दी जा रही है और कौन-सी औषधि इस्तेमाल या लिखी जा रही है।</strong></p>
<p>इस लेख में इन्हीं प्रश्नों का दस्तावेज़-आधारित विश्लेषण किया जा रहा है।</p>
<hr />
<h1>1. सीएमएस एवं ईडी आखिर है क्या?</h1>
<p>सीएमएस एवं ईडी का सामान्य विस्तार <strong>कम्युनिटी मेडिकल सर्विस एंड एसेंशियल ड्रग्स</strong> अर्थात <strong>सामुदायिक चिकित्सा सेवा एवं आवश्यक औषधियां</strong> है।</p>
<p>भारत में इसके नाम से अनेक अलग-अलग संस्थाओं, परिषदों और प्रशिक्षण संस्थानों द्वारा पाठ्यक्रम संचालित किए जाने के प्रमाण मिलते हैं। यही पहला महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पैदा करता है।</p>
<p><strong>“सीएमएस एवं ईडी” नाम अपने-आप में एक ऐसा एकल राष्ट्रीय चिकित्सकीय डिग्री नाम नहीं है जिसकी स्थिति प्रत्येक संस्था और प्रत्येक राज्य में समान हो।</strong></p>
<p>उदाहरण के लिए, एक संस्था अपने ही विवरण में स्पष्ट करती है कि वह सीएमएस एवं ईडी का पाठ्यक्रम या डिप्लोमा जारी नहीं करती, बल्कि पाठ्यक्रम पूरा करने वालों को स्वैच्छिक व्यावसायिक सदस्यता देती है और स्वयं को केंद्र या राज्य सरकार से संबद्ध नहीं बताती।</p>
<p>दूसरी ओर, पंजाब पैरामेडिकल काउंसिल से संबंधित उपलब्ध दस्तावेजों में सीएमएस एवं ईडी पाठ्यक्रम के लिए अध्यापक की योग्यता तक निर्धारित दिखाई देती है, जिसमें संबंधित विषय के अध्यापक के लिए एमबीबीएस योग्यता का उल्लेख है। यह पाठ्यक्रम-व्यवस्था के अस्तित्व को दर्शाता है, लेकिन इससे अपने-आप चिकित्सा अभ्यास का अधिकार सिद्ध नहीं होता।</p>
<p>इसलिए किसी भी कानूनी विवाद में केवल यह कहना कि—</p>
<blockquote><p>“मेरे पास सीएमएस एवं ईडी प्रमाणपत्र है”</p></blockquote>
<p>पर्याप्त नहीं है।</p>
<p>यह भी देखना पड़ेगा कि—</p>
<ul>
<li>प्रमाणपत्र किसने जारी किया?</li>
<li>पंजीकरण किस परिषद ने किया?</li>
<li>वह परिषद किस कानून के अंतर्गत बनी?</li>
<li>क्या संबंधित राज्य उस परिषद के पंजीकरण को मानता है?</li>
<li>क्या उस व्यक्ति को किसी राज्य के चिकित्सा पंजी में दर्ज किया गया है?</li>
<li>क्या कोई राज्य अधिसूचना उपलब्ध है?</li>
<li>कौन-सी सेवाएं दी जा रही हैं?</li>
<li>कौन-सी दवाएं इस्तेमाल की जा रही हैं?</li>
</ul>
<p>यही वास्तविक कानूनी ढांचा है।</p>
<hr />
<h1>2. सीएमएस एवं ईडी के पक्ष में सबसे महत्वपूर्ण सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय</h1>
<h2>सुभाषिस बक्शी बनाम पश्चिम बंगाल मेडिकल काउंसिल, 2003</h2>
<p>यह इस पूरे विषय का सबसे महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय है।</p>
<p>सर्वोच्च न्यायालय ने 14 फरवरी 2003 को इस मामले का निर्णय दिया। मामला पश्चिम बंगाल के लगभग 337 सामुदायिक चिकित्सा सेवा डिप्लोमा धारकों से संबंधित था। वे ऐसे संस्थानों से प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके थे जिन्हें पश्चिम बंगाल राज्य की व्यवस्था में मान्यता प्राप्त थी और उनमें से कई राज्य द्वारा संचालित स्वास्थ्य केंद्रों में नियुक्त थे।</p>
<p>यहां सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि पश्चिम बंगाल सरकार ने स्वयं 1980 में राज्य चिकित्सा संकाय की वैधानिक व्यवस्था में सामुदायिक चिकित्सा सेवा डिप्लोमा का प्रावधान किया था।</p>
<p>उस व्यवस्था में—</p>
<ul>
<li>पाठ्यक्रम निर्धारित था,</li>
<li>मान्यता प्राप्त संस्थान थे,</li>
<li>परीक्षा थी,</li>
<li>डिप्लोमा प्रदान किया जाता था,</li>
<li>डिप्लोमा धारकों का पंजी रखा जाना था,</li>
<li>और उनके अभ्यास को विनियमित, पर्यवेक्षित तथा सीमित करने की व्यवस्था थी।</li>
</ul>
<p>इसलिए यह मामला किसी निजी संस्था द्वारा केवल प्रमाणपत्र जारी किए जाने का मामला नहीं था। यहां <strong>राज्य सरकार द्वारा निर्मित नियामकीय ढांचा</strong> मौजूद था।</p>
<hr />
<h1>3. पश्चिम बंगाल की उस व्यवस्था का उद्देश्य क्या था?</h1>
<p>सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में पश्चिम बंगाल की अधिसूचना के उद्देश्य स्पष्ट रूप से दर्ज हैं।</p>
<p>प्रशिक्षण का उद्देश्य स्वास्थ्य केंद्रों और सहायक स्वास्थ्य केंद्रों के लिए मानव संसाधन तैयार करना था।</p>
<p>इसमें समुदाय की—</p>
<ul>
<li>स्वास्थ्य संवर्धन,</li>
<li>रोग-निवारण,</li>
<li>उपचारात्मक देखभाल</li>
</ul>
<p>को शामिल किया गया था।</p>
<p>प्रशिक्षण पूरा करने के बाद प्रशिक्षित व्यक्ति ग्रामीण आबादी में सामान्य बीमारियों तथा कुछ संक्रामक रोगों, कुपोषण, सर्पदंश और कीटनाशक विषाक्तता आदि की पहचान एवं उपचार कर सके, ऐसा प्रशिक्षण ढांचे में रखा गया था। साथ ही गंभीर रोगों के लक्षण पहचानकर रोगी को उच्च केंद्र पर भेजने की व्यवस्था भी प्रशिक्षण का हिस्सा थी।</p>
<p>यह बिंदु महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि उस विशिष्ट राज्य व्यवस्था में सामुदायिक चिकित्सा सेवा का विचार <strong>प्राथमिक एवं ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा</strong> से जुड़ा था।</p>
<hr />
<h1>4. क्या उस मामले में निजी चिकित्सा अभ्यास की अनुमति थी?</h1>
<p>यहां भी सावधानी जरूरी है।</p>
<p>सर्वोच्च न्यायालय के रिकॉर्ड में यह स्पष्ट है कि उस व्यवस्था में डिप्लोमा धारकों के अधिकार सीमित थे। उच्च न्यायालय के पहले के आदेश में निजी अभ्यास का अधिकार नहीं माना गया था और पंजीकरण का संबंध निर्धारित सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों में कार्य से था।</p>
<p>बाद की सरकारी व्यवस्थाओं में उन्हें ग्रामीण आबादी की सामान्य बीमारियों के उपचार का अधिकार दिया गया, लेकिन प्रमाणपत्र और अन्य दस्तावेज जारी करने के प्रश्न पर अलग-अलग सरकारी आदेश और विवाद हुए।</p>
<p>यानी यह निर्णय यह नहीं कहता कि—</p>
<blockquote><p>“सीएमएस एवं ईडी प्रमाणपत्र वाला प्रत्येक व्यक्ति भारत में कहीं भी बिना किसी राज्यीय शर्त के निजी अस्पताल या क्लिनिक चला सकता है।”</p></blockquote>
<p>यह निष्कर्ष इस फैसले से नहीं निकलता।</p>
<hr />
<h1>5. फिर सर्वोच्च न्यायालय ने औषधि लिखने के अधिकार के बारे में क्या कहा?</h1>
<p>यहीं यह फैसला सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है।</p>
<p>विवाद यह था कि यदि किसी व्यक्ति को विशिष्ट परिस्थितियों में रोग का उपचार करने का अधिकार दिया गया है, तो क्या उपचार से संबंधित आवश्यक औषधि लिखने के अधिकार को पूरी तरह अलग किया जा सकता है।</p>
<p>सर्वोच्च न्यायालय ने <strong>डॉ. मुख्तियार चंद बनाम पंजाब राज्य</strong> के निर्णय का सहारा लिया और माना कि किसी चिकित्सा पद्धति में उपचार का अधिकार और उस पद्धति की औषधि लिखने का अधिकार आपस में जुड़े हुए हैं। न्यायालय ने कहा कि जिस सीमा तक उपचार का अधिकार वैध रूप से दिया गया है, उस सीमा में उससे संबंधित औषधि लिखने का अधिकार भी अलग करके नहीं देखा जा सकता।</p>
<p>लेकिन इस पूरे सिद्धांत का आधार फिर वही है—</p>
<p><strong>पहले उपचार का वैध अधिकार होना चाहिए।</strong></p>
<p>अर्थात केवल “मैं सीएमएस एवं ईडी हूं” कहना पर्याप्त नहीं; यह दिखाना होगा कि संबंधित राज्य के कानून या वैध पंजीकरण व्यवस्था ने उस व्यक्ति को किस सीमा तक चिकित्सा सेवा का अधिकार दिया है।</p>
<hr />
<h1>6. डॉ. मुख्तियार चंद बनाम पंजाब राज्य, 1998 का महत्व</h1>
<p>यह दूसरा अत्यंत महत्वपूर्ण सर्वोच्च न्यायालय का फैसला है।</p>
<p>मामला <strong>औषधि एवं प्रसाधन सामग्री नियम, 1945 के नियम 2(ईई)(iii)</strong> से संबंधित था।</p>
<p>सर्वोच्च न्यायालय ने इस नियम को वैध माना। लेकिन साथ ही उसने एक महत्वपूर्ण सीमा स्पष्ट की।</p>
<p>नियम का उद्देश्य “पंजीकृत चिकित्सक” की परिभाषा को औषधि कानून के संदर्भ में निर्धारित करना था। यह नियम अपने-आप किसी नए चिकित्सा पंजीकरण की व्यवस्था बनाने वाला कानून नहीं था।</p>
<p>सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार द्वारा किसी व्यक्ति या वर्ग को आधुनिक वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति में अभ्यास करने वाला घोषित करने की व्यवस्था तभी प्रभावी हो सकती है जब संबंधित राज्य की चिकित्सा पंजी व्यवस्था और राज्य कानून उस स्थिति को समर्थन देते हों।</p>
<p>यह निर्णय सीएमएस एवं ईडी के विश्लेषण में बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे एक बुनियादी सिद्धांत सामने आता है:</p>
<h3>औषधि कानून और चिकित्सा अभ्यास कानून एक ही चीज नहीं हैं।</h3>
<p>किसी व्यक्ति का औषधि कानून के संदर्भ में दर्ज होना अपने-आप उस व्यक्ति को हर प्रकार की चिकित्सा सेवा का असीमित अधिकार नहीं देता।</p>
<hr />
<h1>7. 2023 का बहारुल इस्लाम फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?</h1>
<p><strong>बहारुल इस्लाम बनाम इंडियन मेडिकल एसोसिएशन</strong>, सर्वोच्च न्यायालय, 24 जनवरी 2023, ने डॉ. मुख्तियार चंद के सिद्धांतों की पुनः चर्चा की।</p>
<p>सर्वोच्च न्यायालय ने इस संदर्भ में स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के आधुनिक वैज्ञानिक चिकित्सा अभ्यास के अधिकार को केवल औषधि नियमों की किसी एक परिभाषा से तय नहीं किया जा सकता।</p>
<p>राज्य में पंजीकरण, संबंधित राज्य कानून और लागू केंद्रीय कानूनों को साथ पढ़ना आवश्यक है।</p>
<p>यही वह बिंदु है जिसे सीएमएस एवं ईडी से जुड़े कानूनी लेखों में अक्सर छोड़ दिया जाता है।</p>
<p>यदि कोई व्यक्ति केवल यह तर्क देता है—</p>
<blockquote><p>“नियम 2(ईई)(iii) में प्रावधान है, इसलिए मैं आधुनिक चिकित्सा का अभ्यास कर सकता हूं”</p></blockquote>
<p>तो तर्क अधूरा है।</p>
<p>पहले यह दिखाना होगा कि संबंधित राज्य के कानून के अंतर्गत व्यक्ति की स्थिति क्या है।</p>
<hr />
<h1>8. क्या इसका अर्थ है कि सीएमएस एवं ईडी स्वयं अवैध है?</h1>
<p><strong>नहीं।</strong></p>
<p>यह निष्कर्ष उपलब्ध न्यायिक सामग्री से नहीं निकलता।</p>
<p>किसी पाठ्यक्रम का अस्तित्व, उसका अध्ययन करना और प्रमाणपत्र प्राप्त करना अपने-आप अपराध नहीं है।</p>
<p>कानूनी प्रश्न तब पैदा होता है जब उस प्रमाणपत्र के आधार पर ऐसा अधिकार दावा किया जाए जो संबंधित राज्य के कानून ने नहीं दिया है।</p>
<p>इसीलिए तीन बातें अलग रखनी चाहिए—</p>
<h3>पहली:</h3>
<p><strong>सीएमएस एवं ईडी पाठ्यक्रम/प्रमाणपत्र का अस्तित्व।</strong></p>
<h3>दूसरी:</h3>
<p><strong>उस प्रमाणपत्र के आधार पर किसी परिषद का पंजीकरण।</strong></p>
<h3>तीसरी:</h3>
<p><strong>राज्य कानून के अंतर्गत वास्तविक चिकित्सा अभ्यास का अधिकार।</strong></p>
<p>तीसरी चीज का निर्धारण पहली दो चीजों से अपने-आप नहीं हो जाता।</p>
<hr />
<h1>9. झारखंड हाईकोर्ट का राम कृष्ण पॉल मामला</h1>
<p>2018 का <strong>राम कृष्ण पॉल बनाम झारखंड राज्य</strong> इस विषय में अत्यंत महत्वपूर्ण है।</p>
<p>याचिकाकर्ता ने सीएमएस एवं ईडी पाठ्यक्रम पूरा किया था और उसने मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी से ग्रामीण क्षेत्रों में सामान्य रोगों के उपचार के लिए अनुमति तथा अनापत्ति प्रमाणपत्र मांगा था।</p>
<p>उसने सर्वोच्च न्यायालय के सुभाषिस बक्शी फैसले पर भरोसा किया।</p>
<p>यहां एक महत्वपूर्ण बात हुई:</p>
<p>झारखंड हाईकोर्ट ने सीधे यह घोषित नहीं किया कि याचिकाकर्ता को पूरे झारखंड में चिकित्सा अभ्यास का अधिकार है।</p>
<p>न्यायालय ने उसे नया अभ्यावेदन देने की स्वतंत्रता दी और संबंधित अधिकारी को कानून के अनुसार उस पर निर्णय लेने का निर्देश दिया।</p>
<p>इस फैसले का वास्तविक महत्व यह है कि—</p>
<p><strong>सीएमएस एवं ईडी के आधार पर राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण से अभ्यास की अनुमति मांगने का प्रश्न न्यायालय के सामने वास्तविक कानूनी विवाद के रूप में आया।</strong></p>
<p>लेकिन इसे सरकारी अनापत्ति प्रमाणपत्र समझना गलत होगा।</p>
<hr />
<h1>10. उत्तर प्रदेश का चिकित्सा स्थापना पंजीकरण दस्तावेज</h1>
<p>अब उस दस्तावेज पर आते हैं जिसकी जांच इस पूरी चर्चा में विशेष रूप से की गई।</p>
<p>उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले में <strong>धर्मार्थ चिकित्सा सेवा</strong> नामक चिकित्सा स्थापना के लिए मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय से जारी एक अस्थायी पंजीकरण प्रमाणपत्र उपलब्ध है।</p>
<p>उसमें दर्ज है—</p>
<ul>
<li>चिकित्सा स्थापना का नाम: धर्मार्थ चिकित्सा सेवा</li>
<li>प्रकार: अस्पताल</li>
<li>बिस्तरों की संख्या: 10</li>
<li>व्यक्ति प्रभारी: गौरव यादव</li>
<li>योग्यता: <strong>सीएमएस एवं ईडी</strong></li>
<li>पंजीकरण संख्या: <strong>CMS/234/E.D/234</strong></li>
<li>प्रमाणपत्र संख्या: <strong>CMEE25123525</strong></li>
<li>जारी तिथि: 31 मई 2025।</li>
</ul>
<p>यह दस्तावेज उत्तर प्रदेश के मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय के चिकित्सा स्थापना पंजीकरण प्रारूप में है।</p>
<p>यह एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।</p>
<hr />
<h1>11. लेकिन इस दस्तावेज का कानूनी अर्थ क्या है?</h1>
<p>इस प्रमाणपत्र से इतना अवश्य स्थापित होता है कि उत्तर प्रदेश के चिकित्सा स्थापना पंजीकरण तंत्र में एक ऐसे अस्पताल का पंजीकरण किया गया जिसमें <strong>व्यक्ति प्रभारी की योग्यता सीएमएस एवं ईडी दर्ज की गई।</strong></p>
<p>लेकिन इससे यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि—</p>
<blockquote><p>“उत्तर प्रदेश सरकार ने सीएमएस एवं ईडी को आधुनिक चिकित्सा की स्वतंत्र डिग्री घोषित कर दिया।”</p></blockquote>
<p>ऐसा प्रमाणपत्र में नहीं लिखा है।</p>
<p>इसलिए इस दस्तावेज का सही उपयोग यह है कि इसे <strong>सरकारी चिकित्सा स्थापना पंजीकरण प्रणाली में सीएमएस एवं ईडी योग्यता के वास्तविक दर्ज होने का दस्तावेजी प्रमाण</strong> माना जाए।</p>
<p>इसे उससे आगे बढ़ाकर अखिल भारतीय चिकित्सा अभ्यास लाइसेंस कहना उचित नहीं होगा।</p>
<hr />
<h1>12. उत्तर प्रदेश का यह दस्तावेज फिर भी महत्वपूर्ण क्यों है?</h1>
<p>क्योंकि यह किसी निजी संस्था की वेबसाइट पर प्रकाशित दावा मात्र नहीं है।</p>
<p>यह मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय के चिकित्सा स्थापना पंजीकरण ढांचे से संबंधित दस्तावेज है। प्रमाणपत्र स्वयं यह बताता है कि यह कंप्यूटर द्वारा निर्मित प्रमाणपत्र है और उसकी वैधता तथा वर्तमान स्थिति ऑनलाइन जांची जा सकती है।</p>
<p>इससे एक बात सामने आती है:</p>
<p><strong>सरकारी चिकित्सा स्थापना पंजीकरण व्यवस्था में सीएमएस एवं ईडी योग्यता वाले व्यक्ति का नाम और योग्यता दर्ज होना व्यवहारिक रूप से संभव हुआ है।</strong></p>
<p>लेकिन व्यक्ति की व्यक्तिगत चिकित्सा योग्यता और चिकित्सा स्थापना की पंजीकरण स्थिति को अलग-अलग पढ़ना आवश्यक है।</p>
<hr />
<h1>13. कर्नाटक हाईकोर्ट का निर्णय—सीएमएस एवं ईडी के विरुद्ध महत्वपूर्ण उदाहरण</h1>
<p>20 दिसंबर 2023 को कर्नाटक हाईकोर्ट ने <strong>श्री डॉ. अन्नैया एन. बनाम कर्नाटक राज्य</strong> मामले में सीएमएस-ईडी प्रमाणपत्र वाले व्यक्ति की चिकित्सा स्थापना पंजीकरण याचिका पर निर्णय दिया।</p>
<p>याचिकाकर्ता के पास सीएमएस-ईडी प्रमाणपत्र था और उसने निजी क्लिनिक चलाने के लिए कर्नाटक निजी चिकित्सा प्रतिष्ठान कानून के अंतर्गत पंजीकरण चाहा था।</p>
<p>प्राधिकरण ने आवेदन यह कहते हुए अस्वीकार किया था कि उसकी योग्यता उस कानून के अंतर्गत “निजी चिकित्सा व्यवसायी” की परिभाषा में नहीं आती।</p>
<p>कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस वैधानिक ढांचे में याचिकाकर्ता के पक्ष में वह पंजीकरण अधिकार स्वीकार नहीं किया।</p>
<p>यह फैसला अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिखाता है कि—</p>
<h3>किसी राज्य में सीएमएस-ईडी प्रमाणपत्र होना पर्याप्त नहीं, यदि उस राज्य का विशिष्ट कानून निजी चिकित्सा स्थापना के लिए दूसरी योग्यता निर्धारित करता है।</h3>
<p>इससे उत्तर प्रदेश के दस्तावेज का महत्व कम नहीं होता; बल्कि यह समझने में मदद मिलती है कि <strong>राज्य-विशिष्ट कानून निर्णायक भूमिका निभाते हैं।</strong></p>
<hr />
<h1>14. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का संजीव कुमार पाराशर मामला</h1>
<p>1 दिसंबर 2021 को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के सामने <strong>संजीव कुमार पाराशर बनाम मध्य प्रदेश राज्य</strong> मामला आया।</p>
<p>आवेदक के पास सीएमएस एवं ईडी प्रमाणपत्र था और उसने दावा किया कि वह एलोपैथिक दवाएं लिखने का अधिकार रखता है।</p>
<p>उसके विरुद्ध औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम के अंतर्गत मामला दर्ज हुआ था। आरोप था कि उसने ऐसी दवा लिखी जो उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर थी, विशेष रूप से डाइक्लोफेनाक सोडियम इंजेक्शन से संबंधित आरोप सामने आया।</p>
<p>न्यायालय ने अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया।</p>
<p>यह फैसला सीएमएस एवं ईडी को पूरी तरह अवैध घोषित नहीं करता, लेकिन यह एक महत्वपूर्ण चेतावनी देता है:</p>
<h3>प्रमाणपत्र होने का अर्थ यह नहीं कि हर दवा स्वतः आपके अधिकार क्षेत्र में आ जाती है।</h3>
<p>विशेषकर ऐसी दवाओं में जिन पर औषधि कानून के अंतर्गत अतिरिक्त प्रतिबंध लागू होते हैं, अलग कानूनी जांच आवश्यक है।</p>
<hr />
<h1>15. तमिलनाडु का 2019 मामला</h1>
<p><strong>डॉ. वी. मुनुसामी बनाम भारत संघ</strong>, मद्रास हाईकोर्ट, 21 नवंबर 2019 में याचिकाकर्ताओं ने सीएमएस एवं ईडी प्रशिक्षण प्राप्त करने का उल्लेख किया था और तमिलनाडु के चिकित्सा स्थापना नियमों के अंतर्गत अपनी स्थिति को लेकर विवाद उठाया था।</p>
<p>मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से यह तर्क था कि उनके पेशे को मौजूदा चिकित्सा स्थापना नियमों में अलग प्रकार से देखा जाना चाहिए और उन्हें पंजीकरण के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए।</p>
<p>न्यायालय ने इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया और कहा कि संबंधित राज्य की नियामकीय व्यवस्था के अंतर्गत पंजीकरण प्रक्रिया का पालन करना होगा।</p>
<p>यह भी बताता है कि किसी व्यक्ति के पास प्रमाणपत्र होने से राज्य की चिकित्सा स्थापना संबंधी पंजीकरण आवश्यकताएं समाप्त नहीं हो जातीं।</p>
<hr />
<h1>16. 2026 में भी सीएमएस एवं ईडी से जुड़े मामले जारी हैं</h1>
<p>यह विषय केवल 2003 या 2018 का पुराना विवाद नहीं है।</p>
<p>भारतीय कानून के उपलब्ध अभिलेखों में अगस्त 2026 तक मद्रास हाईकोर्ट के सीएमएस एवं ईडी से जुड़े नए मामले दिखाई देते हैं।</p>
<p><strong>ए.एम. थंगामुरुगन, एफआरएमपी, सीएमएस एवं ईडी बनाम संयुक्त निदेशक स्वास्थ्य सेवाएं</strong> और <strong>पी. मणिकंदन, एफआरएमपी, सीएमएस एवं ईडी बनाम संयुक्त निदेशक स्वास्थ्य सेवाएं</strong> नामक मामले 19 अगस्त 2026 को दर्ज दिखाई देते हैं।</p>
<p>इससे यह स्पष्ट है कि सीएमएस एवं ईडी की चिकित्सा गतिविधियों को लेकर राज्य स्वास्थ्य अधिकारियों और न्यायालयों के सामने विवाद आज भी मौजूद है।</p>
<p>लेकिन इन मामलों की मौजूदगी का अर्थ यह नहीं कि न्यायालय ने सीएमएस एवं ईडी को अवैध घोषित कर दिया है। उसी तरह केवल मुकदमा लंबित होना अधिकार की पुष्टि भी नहीं करता।</p>
<hr />
<h1>17. पंजाब का विशेष पहलू</h1>
<p>सीएमएस एवं ईडी के संदर्भ में पंजाब विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि <strong>पैरामेडिकल काउंसिल पंजाब</strong> का नाम कई न्यायिक मामलों में सामने आता है।</p>
<p>पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के <strong>पैरामेडिकल काउंसिल बनाम पंजाब राज्य</strong> मामले में परिषद और उससे संबद्ध संस्थाओं की मान्यता, शैक्षणिक गतिविधियों और सरकारी मान्यता से संबंधित गंभीर प्रश्न उठे थे। न्यायालय के रिकॉर्ड में परिषद के बारे में यह भी दर्ज हुआ कि सरकारी विभागों ने उसकी मान्यता और शैक्षणिक अधिकारों के संबंध में प्रश्न उठाए थे।</p>
<p>इसलिए किसी भी कानूनी लेख में यह कहना गलत होगा कि—</p>
<blockquote><p>“पैरामेडिकल काउंसिल पंजाब का पंजीकरण अपने-आप केंद्र सरकार द्वारा चिकित्सा डिग्री की मान्यता है।”</p></blockquote>
<p>ऐसा निष्कर्ष उपलब्ध निर्णयों से नहीं निकलता।</p>
<hr />
<h1>18. लेकिन पंजाब का एक अलग न्यायिक दस्तावेज बहुत महत्वपूर्ण है</h1>
<p><strong>कुलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य एवं अन्य</strong> मामले में फरीदकोट की सिविल अदालत के सामने सीएमएस एवं ईडी प्रमाणपत्र, आवश्यक औषधियों की सूची और उपचार/औषधि लिखने के अधिकार का प्रश्न आया था।</p>
<p>अदालत ने उस मामले के रिकॉर्ड में प्रमाणपत्र, आवश्यक औषधियों तथा अन्य सूची को देखा और यह माना कि संबंधित प्रमाणपत्रधारी अपने प्रमाणपत्र में दी गई शर्तों तथा सरकारी/परिषद निर्देशों के अधीन उपचार एवं औषधि लिखने का अधिकार रखता था। Order CMS &amp; ED</p>
<p>अदालत ने राहत भी प्रमाणपत्र की वैधता अवधि तक सीमित रखी। Order CMS &amp; ED</p>
<p>यह बहुत महत्वपूर्ण है।</p>
<p>क्योंकि इससे यह सिद्ध होता है कि पंजाब के एक न्यायिक रिकॉर्ड में <strong>सीएमएस एवं ईडी प्रमाणपत्र की शर्तों और औषधि सूची को वास्तविक कानूनी प्रश्न के रूप में स्वीकार करके देखा गया था।</strong></p>
<p>लेकिन यह भी एक <strong>विशिष्ट मामले का निर्णय</strong> था, न कि भारत के प्रत्येक सीएमएस एवं ईडी प्रमाणपत्रधारी के लिए अखिल भारतीय घोषणा।</p>
<hr />
<h1>19. आवश्यक औषधि सूची का महत्व</h1>
<p>सीएमएस एवं ईडी से जुड़े वर्तमान दस्तावेजों में “आवश्यक औषधियां” शब्द का विशेष महत्व है।</p>
<p>लेकिन यहां एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना आवश्यक है।</p>
<h3>विश्व स्वास्थ्य संगठन की आवश्यक औषधि सूची</h3>
<p>और</p>
<h3>भारत में किसी व्यक्ति को किसी दवा को लिखने या देने की कानूनी अनुमति</h3>
<p>दो अलग बातें हैं।</p>
<p>किसी दवा का विश्व स्वास्थ्य संगठन की आवश्यक औषधि सूची में होना अपने-आप यह नहीं बताता कि भारत में प्रत्येक स्वास्थ्यकर्मी उसे स्वतंत्र रूप से लिख सकता है।</p>
<p>इसी प्रकार भारत की राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची में दवा होना भी अपने-आप उसे गैर-पर्ची वाली दवा नहीं बनाता।</p>
<p>इसलिए सीएमएस एवं ईडी की किसी औषधि सूची को हमेशा <strong>भारतीय औषधि एवं प्रसाधन सामग्री कानून तथा लागू राज्य कानून</strong> के साथ पढ़ना चाहिए।</p>
<hr />
<h1>20. पर्ची वाली दवाएं और सामान्य गैर-पर्ची दवाएं</h1>
<p>भारत में दवाओं की कानूनी स्थिति केवल “आवश्यक” और “गैर-आवश्यक” के आधार पर तय नहीं होती।</p>
<p>औषधि एवं प्रसाधन सामग्री नियमों में विभिन्न अनुसूचियां हैं।</p>
<p>विशेष रूप से—</p>
<ul>
<li>अनुसूची एच,</li>
<li>अनुसूची एच1,</li>
<li>अनुसूची एक्स</li>
</ul>
<p>से संबंधित दवाओं पर पर्ची संबंधी विशेष नियम लागू होते हैं।</p>
<p>इसलिए किसी परिषद की सूची में किसी दवा का नाम होने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वह दवा हर परिस्थिति में स्वतंत्र रूप से लिखी जा सकती है।</p>
<p>यही कारण है कि मध्य प्रदेश के संजीव कुमार पाराशर मामले में प्रमाणपत्र के बावजूद विशिष्ट दवा को लेकर अलग कानूनी प्रश्न पैदा हुआ।</p>
<hr />
<h1>21. सीएमएस एवं ईडी और पंजीकृत फार्मासिस्ट की भूमिका अलग-अलग है</h1>
<p>भारत में पंजीकृत फार्मासिस्ट की भूमिका <strong>फार्मेसी कानून</strong> के अंतर्गत अलग व्यवस्था है।</p>
<p>इसी प्रकार सीएमएस एवं ईडी का प्रमाणपत्र अपने-आप पंजीकृत फार्मासिस्ट की भूमिका समाप्त नहीं करता।</p>
<p>यदि किसी व्यक्ति के पास दोनों अलग-अलग वैध पंजीकरण हैं, तो प्रत्येक पंजीकरण के अधिकार को उसके संबंधित कानून के अनुसार पढ़ना होगा।</p>
<p>इसलिए—</p>
<p><strong>सीएमएस एवं ईडी पंजीकरण = चिकित्सा/सामुदायिक स्वास्थ्य से संबंधित दावा</strong></p>
<p>और</p>
<p><strong>फार्मेसी पंजीकरण = फार्मेसी से संबंधित वैधानिक भूमिका</strong></p>
<p>को एक-दूसरे में मिला देना कानूनी रूप से उचित नहीं है।</p>
<hr />
<h1>22. क्या सीएमएस एवं ईडी वाला व्यक्ति किसी भी दवा का उपयोग कर सकता है?</h1>
<p><strong>नहीं।</strong></p>
<p>यह निष्कर्ष उपलब्ध न्यायिक सामग्री के आधार पर सुरक्षित रूप से नहीं निकाला जा सकता।</p>
<p>विशेष रूप से—</p>
<ul>
<li>इंजेक्शन,</li>
<li>नियंत्रित दवाएं,</li>
<li>अनुसूची एच1 वाली दवाएं,</li>
<li>अनुसूची एक्स वाली दवाएं,</li>
<li>विशेष रूप से प्रतिबंधित औषधियां,</li>
<li>दवाओं के अनुचित संयोजन</li>
</ul>
<p>के मामले में अलग कानून लागू हो सकते हैं।</p>
<p>मध्य प्रदेश का संजीव कुमार पाराशर मामला इसी बात का वास्तविक उदाहरण है कि अदालत ने विशिष्ट दवा के संबंध में कानूनी स्थिति को गंभीरता से देखा।</p>
<hr />
<h1>23. क्या सीएमएस एवं ईडी का प्रमाणपत्र होने से निजी अस्पताल चलाया जा सकता है?</h1>
<p>यह प्रश्न भी राज्य-विशिष्ट है।</p>
<p>उत्तर प्रदेश के अमेठी दस्तावेज में सीएमएस एवं ईडी योग्यता वाले व्यक्ति को दस बिस्तरों की चिकित्सा स्थापना में व्यक्ति प्रभारी के रूप में दर्ज किया गया।</p>
<p>दूसरी तरफ कर्नाटक में सीएमएस-ईडी धारक को वहां के निजी चिकित्सा स्थापना कानून के तहत पंजीकरण देने से इनकार किया गया और हाईकोर्ट ने उस विशेष वैधानिक ढांचे में उस स्थिति को स्वीकार नहीं किया।</p>
<p>इससे बिल्कुल स्पष्ट है:</p>
<h3>“सीएमएस एवं ईडी” के लिए पूरे भारत में एक समान निजी चिकित्सा स्थापना नियम नहीं माना जा सकता।</h3>
<p>राज्य का अपना कानून निर्णायक हो सकता है।</p>
<hr />
<h1>24. उत्तर प्रदेश के दस्तावेज से क्या सिद्ध होता है और क्या नहीं?</h1>
<h3>जो सिद्ध होता है:</h3>
<p>उत्तर प्रदेश के अमेठी जिले में मुख्य चिकित्सा अधिकारी के चिकित्सा स्थापना पंजीकरण प्रमाणपत्र में एक व्यक्ति को—</p>
<p><strong>व्यक्ति प्रभारी — सीएमएस एवं ईडी</strong></p>
<p>के रूप में दर्ज किया गया।</p>
<h3>जो सिद्ध नहीं होता:</h3>
<p>इससे यह सिद्ध नहीं होता कि उत्तर प्रदेश ने सीएमएस एवं ईडी को एमबीबीएस के बराबर मान लिया।</p>
<p>यह भी सिद्ध नहीं होता कि प्रत्येक सीएमएस एवं ईडी धारक को पूरे उत्तर प्रदेश में स्वतंत्र चिकित्सा अभ्यास का अधिकार है।</p>
<p>यह भी सिद्ध नहीं होता कि हर प्रकार की एलोपैथिक दवा लिखना वैध है।</p>
<p>इसलिए दस्तावेज का महत्व वास्तविक है, लेकिन उसका अर्थ भी उतना ही सटीक रखा जाना चाहिए।</p>
<hr />
<h1>25. क्या सीएमएस एवं ईडी को “पूरे भारत में अवैध” कहना सही है?</h1>
<p><strong>नहीं।</strong></p>
<p>ऐसा व्यापक निष्कर्ष उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड से समर्थित नहीं है।</p>
<p>क्यों?</p>
<p>क्योंकि—</p>
<ul>
<li>सर्वोच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल की वैधानिक सीएमएस व्यवस्था को स्वीकार किया और उसके अंतर्गत उपचार तथा उससे संबंधित औषधि लिखने के अधिकार की चर्चा की।</li>
<li>डॉ. मुख्तियार चंद मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य कानून आधारित पंजीकरण की भूमिका को स्वीकार किया।</li>
<li>झारखंड में सीएमएस एवं ईडी धारक की अनुमति संबंधी याचिका पर राज्य अधिकारी को कानून के अनुसार निर्णय लेने का निर्देश दिया गया।</li>
<li>उत्तर प्रदेश में सीएमएस एवं ईडी योग्यता वाला व्यक्ति सरकारी चिकित्सा स्थापना पंजीकरण प्रमाणपत्र में व्यक्ति प्रभारी के रूप में दर्ज हुआ।</li>
<li>दूसरी ओर कर्नाटक और मध्य प्रदेश के मामलों में राज्य कानून तथा विशिष्ट दवाओं से संबंधित सीमाएं सामने आईं। इसलिए सही शब्द <strong>“राज्य-विशिष्ट और अधिकार-विशिष्ट कानूनी स्थिति”</strong> है।</li>
</ul>
<hr />
<h1>26. क्या सीएमएस एवं ईडी को एमबीबीएस के बराबर माना गया है?</h1>
<p>इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट है:</p>
<p><strong>उपलब्ध निर्णयों से सीएमएस एवं ईडी को एमबीबीएस के बराबर घोषित नहीं किया गया है।</strong></p>
<p>और यह बात सीएमएस एवं ईडी की कानूनी स्थिति समझने के लिए आवश्यक भी नहीं है।</p>
<p>किसी व्यक्ति को किसी विशिष्ट राज्य कानून के अंतर्गत सीमित सामुदायिक या प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा का अधिकार मिलने के लिए उसे एमबीबीएस के बराबर घोषित करना आवश्यक नहीं है।</p>
<p>सुभाषिस बक्शी मामले में भी अधिकार एक <strong>विशिष्ट राज्यीय वैधानिक व्यवस्था, प्रशिक्षण, पंजीकरण और निर्धारित कार्यक्षेत्र</strong> के संदर्भ में आया था।</p>
<p>इसलिए “बराबर या नहीं” की बहस से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है:</p>
<blockquote><p><strong>किस राज्य में, किस पंजीकरण के आधार पर, किस प्रकार की सेवा, किस सीमा तक और किन औषधियों के साथ दी जा सकती है?</strong></p></blockquote>
<hr />
<h1>27. “सीएमएस एवं ईडी अवैध है” और “सीएमएस एवं ईडी से हर चिकित्सा सेवा वैध है”—दोनों अतिवादी निष्कर्ष क्यों हैं?</h1>
<p>पहला निष्कर्ष इसलिए गलत हो सकता है क्योंकि न्यायालयों ने ऐसे मामलों में सीएमएस एवं ईडी या सामुदायिक चिकित्सा सेवा से संबंधित वास्तविक वैधानिक ढांचे और पंजीकरण अधिकारों पर विचार किया है।</p>
<p>दूसरा निष्कर्ष इसलिए गलत है क्योंकि कई राज्यों में अलग कानून लागू हैं और कुछ मामलों में सीएमएस-ईडी प्रमाणपत्र पर्याप्त नहीं माना गया।</p>
<p>कर्नाटक का निर्णय इसका सीधा उदाहरण है।</p>
<p>मध्य प्रदेश का मामला यह दिखाता है कि दवा के स्तर पर भी स्वतंत्र सीमाएं हो सकती हैं।</p>
<p>इसलिए सही कानूनी स्थिति बीच की है:</p>
<h3><strong>सीएमएस एवं ईडी की वैधता और उसके आधार पर चिकित्सा अभ्यास की सीमा एक ही प्रश्न नहीं हैं।</strong></h3>
<hr />
<h1>28. न्यायालयों के फैसलों से निकला सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत</h1>
<p>पूरे दस्तावेजी अध्ययन से निम्न कानूनी क्रम सामने आता है:</p>
<h3>चरण 1 — योग्यता</h3>
<p>व्यक्ति के पास वास्तविक सीएमएस एवं ईडी प्रशिक्षण/प्रमाणपत्र है या नहीं?</p>
<h3>चरण 2 — जारी करने वाली संस्था</h3>
<p>प्रमाणपत्र किस संस्था ने जारी किया?</p>
<h3>चरण 3 — पंजीकरण</h3>
<p>क्या संबंधित राज्य में उस व्यक्ति का कोई वैध पंजीकरण है?</p>
<h3>चरण 4 — राज्य कानून</h3>
<p>क्या राज्य कानून उस पंजीकरण और योग्यता को किसी विशिष्ट स्वास्थ्य सेवा की अनुमति देता है?</p>
<h3>चरण 5 — स्थापना पंजीकरण</h3>
<p>क्या क्लिनिक, अस्पताल या चिकित्सा स्थापना संबंधित राज्य के नियमों के अनुसार पंजीकृत है?</p>
<h3>चरण 6 — दवा कानून</h3>
<p>जिस दवा का उपयोग या लेखन किया जा रहा है, उसकी कानूनी स्थिति क्या है?</p>
<h3>चरण 7 — सेवा का दायरा</h3>
<p>क्या सेवा प्राथमिक उपचार, सामान्य रोग, आपात प्राथमिक सहायता, स्वास्थ्य परामर्श या किसी विशेष विशेषज्ञता के अंतर्गत आती है?</p>
<h3>चरण 8 — रेफरल</h3>
<p>क्या गंभीर रोगी को समय पर उच्च केंद्र भेजने की व्यवस्था है?</p>
<p>यही पूरा कानूनी परीक्षण है।</p>
<hr />
<h1>29. 2003 के सुभाषिस बक्शी निर्णय का सही अर्थ</h1>
<p>इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत यह नहीं है कि—</p>
<blockquote><p>“सीएमएस एवं ईडी पूरे भारत में डॉक्टर है।”</p></blockquote>
<p>बल्कि यह है कि—</p>
<p><strong>जहां राज्य ने वैधानिक रूप से सामुदायिक चिकित्सा सेवा की एक श्रेणी बनाई, उसका प्रशिक्षण निर्धारित किया, पंजीकरण बनाया और उसके कार्यक्षेत्र को निर्धारित किया, वहां उस वैध कार्यक्षेत्र में उपचार के अधिकार से संबंधित आवश्यक औषधि लिखने के अधिकार को पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता।</strong></p>
<p>यह बहुत अधिक सटीक कानूनी व्याख्या है।</p>
<hr />
<h1>30. 1998 के मुख्तियार चंद निर्णय का सही अर्थ</h1>
<p>इस निर्णय से यह सिद्ध होता है कि—</p>
<p><strong>औषधि नियमों में “पंजीकृत चिकित्सक” की परिभाषा और वास्तविक चिकित्सा पंजीकरण दो अलग कानूनी अवधारणाएं हैं।</strong></p>
<p>राज्य कानून और राज्य पंजीकरण का महत्व बना रहता है।</p>
<p>इसलिए केवल औषधि कानून का सहारा लेकर किसी व्यक्ति का पूर्ण चिकित्सा अभ्यास अधिकार स्थापित करना पर्याप्त नहीं है।</p>
<hr />
<h1>31. 2023 के बहारुल इस्लाम निर्णय का महत्व</h1>
<p>यह निर्णय पहले के सिद्धांत को और साफ करता है।</p>
<p>किसी व्यक्ति को आधुनिक चिकित्सा पद्धति में अभ्यास का अधिकार प्राप्त करने के लिए संबंधित कानूनों में निर्धारित योग्यता और पंजीकरण व्यवस्था को देखना आवश्यक है। राज्य कानून यदि किसी विशिष्ट श्रेणी को विशिष्ट अधिकार देता है तो उसका प्रभाव उस राज्य की व्यवस्था में देखा जा सकता है।</p>
<p>इसका सीधा मतलब है:</p>
<p><strong>सीएमएस एवं ईडी का कानूनी विश्लेषण राज्य-दर-राज्य करना होगा।</strong></p>
<hr />
<h1>32. क्या केवल प्रमाणपत्र देखकर पुलिस या स्वास्थ्य अधिकारी कार्रवाई कर सकते हैं?</h1>
<p>यह प्रश्न प्रत्येक मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगा।</p>
<p>यदि किसी व्यक्ति पर कानून के तहत प्राथमिकी दर्ज है, तो केवल यह कहना कि “मेरे पास सीएमएस एवं ईडी प्रमाणपत्र है” हमेशा जांच को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं होगा।</p>
<p>2026 के तमिलनाडु मामलों की उपस्थिति यही दिखाती है कि सीएमएस एवं ईडी धारकों से जुड़े विवाद अभी भी पुलिस और स्वास्थ्य विभाग के स्तर पर हो रहे हैं।</p>
<p>इसी तरह मध्य प्रदेश में औषधि कानून के तहत कार्रवाई हुई और न्यायालय ने अग्रिम जमानत देने से इनकार किया।</p>
<p>इसलिए प्रमाणपत्र होने पर भी व्यवहार में <strong>दस्तावेज, पंजीकरण, दवा की सूची और राज्य कानून</strong> सुरक्षित रखना महत्वपूर्ण है।</p>
<hr />
<h1>33. क्या हर सीएमएस एवं ईडी प्रमाणपत्र समान माना जा सकता है?</h1>
<p><strong>नहीं।</strong></p>
<p>यह शायद इस पूरे विषय की सबसे महत्वपूर्ण व्यावहारिक बात है।</p>
<p>एक संस्था का सीएमएस एवं ईडी प्रमाणपत्र दूसरे संस्था के प्रमाणपत्र के बराबर नहीं माना जा सकता जब तक—</p>
<ul>
<li>संस्था की वैधानिक स्थिति,</li>
<li>पंजीकरण,</li>
<li>पाठ्यक्रम,</li>
<li>राज्य मान्यता,</li>
<li>व्यक्तिगत पंजीकरण</li>
</ul>
<p>समान रूप से स्थापित न हों। इसलिए इंटरनेट पर किसी संस्था का यह दावा कि—</p>
<blockquote><p>“हमारा सीएमएस एवं ईडी सरकार से मान्यता प्राप्त है”</p></blockquote>
<p>तभी महत्वपूर्ण होगा जब उसके समर्थन में वास्तविक सरकारी अधिसूचना, कानून, पंजीकरण या न्यायिक रिकॉर्ड मौजूद हो।</p>
<hr />
<h1>34. सरकारी पंजीकरण और पेशेवर मान्यता में अंतर</h1>
<p>उत्तर प्रदेश का अमेठी प्रमाणपत्र इस अंतर को बहुत अच्छी तरह दिखाता है।</p>
<p>सरकार ने चिकित्सा स्थापना को पंजीकरण दिया और उसमें व्यक्ति प्रभारी की योग्यता दर्ज की।</p>
<p>लेकिन चिकित्सा स्थापना का पंजीकरण और किसी व्यक्ति की स्वतंत्र चिकित्सा योग्यता का पंजीकरण दो अलग प्रश्न हैं।</p>
<p>इसलिए किसी क्लिनिक या अस्पताल के पास सरकारी स्थापना पंजीकरण होना अपने-आप उस व्यक्ति की हर चिकित्सा गतिविधि को वैध नहीं बनाता।</p>
<p>और उल्टा भी—किसी व्यक्ति का पेशेवर पंजीकरण होने पर भी स्थापना को अलग कानून के तहत पंजीकृत करना पड़ सकता है।</p>
<hr />
<h1>35. सीएमएस एवं ईडी की कानूनी स्थिति का सबसे संतुलित निष्कर्ष</h1>
<p>पूरे उपलब्ध न्यायिक और दस्तावेजी रिकॉर्ड के आधार पर सीएमएस एवं ईडी के बारे में सबसे सटीक निष्कर्ष इस प्रकार रखा जा सकता है:</p>
<h3>पहला निष्कर्ष</h3>
<p><strong>सीएमएस एवं ईडी नामक पाठ्यक्रम या प्रमाणपत्र का अस्तित्व अपने-आप में अपराध या सार्वभौमिक रूप से निषिद्ध योग्यता नहीं कहा जा सकता।</strong></p>
<h3>दूसरा निष्कर्ष</h3>
<p><strong>सीएमएस एवं ईडी को भारत में एक समान राष्ट्रीय एमबीबीएस-समकक्ष चिकित्सकीय योग्यता के रूप में मान्यता प्राप्त होने का कोई सार्वभौमिक सर्वोच्च न्यायालय निर्णय नहीं मिला।</strong></p>
<h3>तीसरा निष्कर्ष</h3>
<p><strong>सुभाषिस बक्शी का निर्णय वास्तविक और महत्वपूर्ण है, लेकिन वह पश्चिम बंगाल की विशिष्ट वैधानिक सामुदायिक चिकित्सा सेवा व्यवस्था पर आधारित है।</strong></p>
<h3>चौथा निष्कर्ष</h3>
<p><strong>डॉ. मुख्तियार चंद और बहारुल इस्लाम के फैसले बताते हैं कि राज्य कानून, राज्य पंजीकरण और औषधि कानून को अलग-अलग देखना आवश्यक है।</strong></p>
<h3>पांचवां निष्कर्ष</h3>
<p><strong>कुछ राज्यों में सीएमएस एवं ईडी से संबंधित व्यक्तियों को चिकित्सा स्थापना संबंधी सरकारी अभिलेखों में दर्ज किया गया है</strong>, जैसे उत्तर प्रदेश के अमेठी का उपलब्ध प्रमाणपत्र।</p>
<h3>छठा निष्कर्ष</h3>
<p><strong>कुछ राज्यों में वही या समान सीएमएस-ईडी योग्यता निजी चिकित्सा स्थापना पंजीकरण के लिए पर्याप्त नहीं मानी गई</strong>, जैसे कर्नाटक का 2023 मामला।</p>
<h3>सातवां निष्कर्ष</h3>
<p><strong>विशिष्ट दवाओं के उपयोग पर अलग कानूनी प्रतिबंध लागू हो सकते हैं</strong>, जैसा मध्य प्रदेश के 2021 मामले में दिखाई देता है।</p>
<h3>आठवां निष्कर्ष</h3>
<p><strong>2026 में भी सीएमएस एवं ईडी से जुड़े मामले उच्च न्यायालयों में सामने आ रहे हैं</strong>, इसलिए इस विषय की कानूनी बहस समाप्त नहीं हुई है।</p>
<hr />
<h1>36. सीएमएस एवं ईडी की “कानूनी वैधता” को एक वाक्य में कैसे समझें?</h1>
<p>यदि इस पूरे लेख को केवल एक वाक्य में समझाना हो, तो सबसे सटीक वाक्य होगा:</p>
<blockquote><p><strong>“भारत में सीएमएस एवं ईडी की कानूनी स्थिति को केवल प्रमाणपत्र के नाम से तय नहीं किया जा सकता; इसकी वास्तविक वैधता और उससे मिलने वाले चिकित्सा अधिकार संबंधित प्रमाणपत्र जारी करने वाली संस्था, व्यक्तिगत पंजीकरण, राज्य कानून, चिकित्सा स्थापना नियमों तथा औषधि कानून के संयुक्त अध्ययन से निर्धारित होते हैं।”</strong></p></blockquote>
<hr />
<h1>37. सबसे बड़ी गलतफहमियां</h1>
<h2>गलतफहमी 1: “सीएमएस एवं ईडी पूरी तरह फर्जी है।”</h2>
<p>यह बहुत व्यापक कथन है और उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड इसे इस रूप में समर्थन नहीं करता।</p>
<h2>गलतफहमी 2: “सर्वोच्च न्यायालय ने सीएमएस एवं ईडी को पूरे भारत में डॉक्टर बना दिया।”</h2>
<p>यह भी सही नहीं है। सुभाषिस बक्शी का आधार पश्चिम बंगाल का विशिष्ट सरकारी ढांचा था।</p>
<h2>गलतफहमी 3: “सीएमओ ने क्लिनिक पंजीकृत कर दिया, इसलिए हर चिकित्सा कार्य वैध है।”</h2>
<p>उत्तर प्रदेश के दस्तावेज से इतना निष्कर्ष नहीं निकलता।</p>
<h2>गलतफहमी 4: “आवश्यक औषधि सूची में नाम है, इसलिए दवा हमेशा लिख सकते हैं।”</h2>
<p>यह भी सही नहीं है।</p>
<p>दवा की कानूनी श्रेणी और पर्ची संबंधी नियम अलग से देखने होंगे।</p>
<h2>गलतफहमी 5: “एक राज्य में पंजीकरण है, इसलिए पूरे भारत में वही अधिकार है।”</h2>
<p>उपलब्ध फैसले इसके विपरीत राज्य-विशिष्ट व्यवस्था की ओर संकेत करते हैं।</p>
<hr />
<h1>38. भविष्य में सीएमएस एवं ईडी धारक को अपने दस्तावेज कैसे रखने चाहिए?</h1>
<p>किसी भी वास्तविक कानूनी विवाद में निम्न दस्तावेज अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकते हैं:</p>
<ol start="1">
<li>मूल सीएमएस एवं ईडी प्रमाणपत्र।</li>
<li>परिषद का वर्तमान पंजीकरण प्रमाणपत्र।</li>
<li>पंजीकरण नवीनीकरण प्रमाणपत्र।</li>
<li>परिषद द्वारा जारी औषधि सूची।</li>
<li>परिषद के नियम एवं शर्तें।</li>
<li>संबंधित राज्य की चिकित्सा स्थापना पंजीकरण प्रति।</li>
<li>क्लिनिक या अस्पताल का पंजीकरण।</li>
<li>औषधि लाइसेंस, जहां आवश्यक हो।</li>
<li>पंजीकृत फार्मासिस्ट का प्रमाणपत्र, जहां लागू हो।</li>
<li>राज्य स्वास्थ्य विभाग की अधिसूचनाएं।</li>
<li>न्यायालय के संबंधित निर्णय।</li>
<li>गंभीर रोगियों के लिए रेफरल व्यवस्था का दस्तावेजी रिकॉर्ड।</li>
</ol>
<p>इस तरह किसी व्यक्ति का वास्तविक कानूनी ढांचा केवल “मेरे पास सीएमएस प्रमाणपत्र है” पर निर्भर नहीं रहेगा।</p>
<hr />
<h1>39. सीएमएस एवं ईडी के लिए सबसे सुरक्षित कानूनी दृष्टिकोण</h1>
<p>उपलब्ध निर्णयों का अध्ययन बताता है कि सबसे मजबूत कानूनी स्थिति वही होगी जिसमें व्यक्ति अपने अधिकार को <strong>अपने वास्तविक पंजीकरण और वास्तविक कार्यक्षेत्र तक सीमित रखे।</strong></p>
<p>उदाहरण के लिए यदि किसी प्रमाणपत्र में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा और आवश्यक/गैर-पर्ची दवाओं की अनुमति लिखी है, तो उसका प्रयोग उसी दस्तावेज की भाषा, संबंधित राज्य के कानून और औषधि नियमों के साथ पढ़ा जाना चाहिए।</p>
<p>ऐसे मामलों में यह दावा करना अनावश्यक है कि—</p>
<blockquote><p>“मैं हर प्रकार की आधुनिक चिकित्सा कर सकता हूं।”</p></blockquote>
<p>कानून के लिए अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है—</p>
<blockquote><p><strong>“आपके पास कौन-सा वैधानिक पंजीकरण है और वह आपको वास्तव में क्या करने की अनुमति देता है?”</strong></p></blockquote>
<hr />
<h1>40. अंतिम कानूनी निष्कर्ष</h1>
<blockquote class="wp-embedded-content" data-secret="MDN7YpiyNn"><p><a href="https://thepharmacist.in/cms-ed-legal-status-india/">CMS ED Legal Status India: सी एम एस डिप्लोमा की असली सच्चाई | सूप्रीम कोर्ट का सच ।</a></p></blockquote>
<p><iframe class="wp-embedded-content" sandbox="allow-scripts" security="restricted"  title="“CMS ED Legal Status India: सी एम एस डिप्लोमा की असली सच्चाई | सूप्रीम कोर्ट का सच ।” — द फार्मासिस्ट"  src="about:blank" data-opt-src="https://thepharmacist.in/cms-ed-legal-status-india/embed/#?secret=QlK5GRoqTp#?secret=MDN7YpiyNn" data-secret="MDN7YpiyNn" width="600" height="338" frameborder="0" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no"></iframe></p>
<h2><strong>क्या सीएमएस एवं ईडी पूरी तरह अवैध है?</strong></h2>
<p><strong>उपलब्ध भारतीय न्यायिक रिकॉर्ड के आधार पर ऐसा सार्वभौमिक निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।</strong></p>
<h2><strong>क्या सीएमएस एवं ईडी पूरे भारत में एमबीबीएस के बराबर है?</strong></h2>
<p><strong>नहीं। ऐसा कोई सार्वभौमिक कानूनी निष्कर्ष उपलब्ध नहीं है।</strong></p>
<h2><strong>क्या सीएमएस एवं ईडी के आधार पर कहीं भी चिकित्सा अभ्यास स्वतः वैध है?</strong></h2>
<p><strong>नहीं।</strong></p>
<h2><strong>क्या कुछ राज्यों की व्यवस्था में सीएमएस या सामुदायिक चिकित्सा सेवा को वैधानिक भूमिका मिली है?</strong></h2>
<p><strong>हां। पश्चिम बंगाल का सर्वोच्च न्यायालय में विचार किया गया ढांचा इसका सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण है।</strong></p>
<h2><strong>क्या सीएमएस एवं ईडी धारकों से संबंधित वास्तविक सरकारी/न्यायिक रिकॉर्ड अन्य राज्यों में भी हैं?</strong></h2>
<p><strong>हां। झारखंड, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, पंजाब और अन्य स्थानों से न्यायिक अथवा प्रशासनिक रिकॉर्ड उपलब्ध हैं।</strong></p>
<h2><strong>क्या सीएमएस एवं ईडी के आधार पर दवा लिखने का अधिकार कभी न्यायालय द्वारा स्वीकार किया गया है?</strong></h2>
<p><strong>हां, लेकिन महत्वपूर्ण सीमा के साथ।</strong> सुभाषिस बक्शी मामले में यह अधिकार पश्चिम बंगाल की वैध सामुदायिक चिकित्सा सेवा व्यवस्था और वहां के पंजीकरण/कार्य क्षेत्र के संदर्भ में स्वीकार किया गया था।</p>
<h2><strong>क्या इसका अर्थ है कि हर सीएमएस एवं ईडी प्रमाणपत्रधारी को वही अधिकार मिल जाता है?</strong></h2>
<p><strong>नहीं।</strong></p>
<p>यही इस पूरे विषय की सबसे महत्वपूर्ण कानूनी सीमा है।</p>
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<h1>निष्कर्ष: सीएमएस एवं ईडी की असली कानूनी तस्वीर</h1>
<p>सीएमएस एवं ईडी की कानूनी स्थिति को “वैध” या “अवैध” की एक पंक्ति में बांधना भारतीय कानून की वास्तविक स्थिति को अत्यधिक सरल बना देना होगा।</p>
<p>सर्वोच्च न्यायालय का <strong>सुभाषिस बक्शी</strong> फैसला यह दिखाता है कि यदि राज्य सरकार किसी विशिष्ट सामुदायिक चिकित्सा सेवा व्यवस्था को कानून के अंतर्गत बनाती है, प्रशिक्षण और पंजीकरण देती है तथा उसके कार्यक्षेत्र को निर्धारित करती है, तो उस निर्धारित कार्यक्षेत्र में उपचार के अधिकार और उससे संबंधित औषधि लिखने के अधिकार के बीच कृत्रिम विभाजन नहीं किया जा सकता।</p>
<p><strong>डॉ. मुख्तियार चंद</strong> यह बताता है कि औषधि कानून में पंजीकृत चिकित्सक की परिभाषा और वास्तविक चिकित्सा पंजीकरण दो अलग कानूनी विषय हैं तथा राज्य कानून की भूमिका महत्वपूर्ण है।</p>
<p><strong>बहारुल इस्लाम</strong> ने इस सिद्धांत को आधुनिक संदर्भ में फिर स्पष्ट किया और यह दिखाया कि किसी व्यक्ति के चिकित्सा अभ्यास अधिकार का प्रश्न केवल औषधि नियम की एक धारा देखकर तय नहीं किया जा सकता।</p>
<p><strong>राम कृष्ण पॉल</strong> में सीएमएस एवं ईडी धारक द्वारा राज्य स्वास्थ्य अधिकारी से अभ्यास की अनुमति मांगने का प्रश्न सीधे उच्च न्यायालय के सामने आया, लेकिन न्यायालय ने स्वयं सामान्य लाइसेंस घोषित करने के बजाय सक्षम अधिकारी को कानून के अनुसार निर्णय लेने का निर्देश दिया।</p>
<p><strong>उत्तर प्रदेश का अमेठी प्रमाणपत्र</strong> दिखाता है कि सरकारी चिकित्सा स्थापना पंजीकरण तंत्र में सीएमएस एवं ईडी योग्यता वाले व्यक्ति को दस बिस्तरों वाली चिकित्सा स्थापना का व्यक्ति प्रभारी दर्ज किया गया था। यह एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक दस्तावेज है, हालांकि इसे अखिल भारतीय स्वतंत्र चिकित्सा लाइसेंस के रूप में पढ़ना उचित नहीं है।</p>
<p>दूसरी ओर <strong>कर्नाटक का 2023 निर्णय</strong> दिखाता है कि राज्य का विशिष्ट निजी चिकित्सा स्थापना कानून सीएमएस-ईडी योग्यता को पर्याप्त न मान सकता है।</p>
<p><strong>मध्य प्रदेश का 2021 मामला</strong> यह चेतावनी देता है कि किसी प्रमाणपत्र के बावजूद विशिष्ट दवाओं के उपयोग पर औषधि कानून की सीमाएं लागू हो सकती हैं।</p>
<p>और <strong>2026 के मद्रास हाईकोर्ट के मामले</strong> यह बताते हैं कि सीएमएस एवं ईडी से संबंधित चिकित्सा अभ्यास का प्रश्न आज भी न्यायिक विवाद का विषय है।</p>
<p>इसलिए सीएमएस एवं ईडी की सबसे सटीक कानूनी व्याख्या यह है:</p>
<blockquote><p><strong>सीएमएस एवं ईडी को न तो स्वतः अखिल भारतीय चिकित्सकीय लाइसेंस माना जा सकता है और न ही केवल नाम के आधार पर पूरे भारत में अवैध घोषित किया जा सकता है। इसके वास्तविक अधिकार संबंधित राज्य के कानून, वैध पंजीकरण, प्रमाणपत्र जारी करने वाली संस्था की स्थिति, चिकित्सा स्थापना के पंजीकरण और लागू औषधि कानूनों के संयुक्त प्रभाव से निर्धारित होते हैं।</strong></p></blockquote>
<p>यही कारण है कि इस विषय में किसी भी दावे की विश्वसनीयता इस बात से तय होनी चाहिए कि उसके पीछे <strong>कौन-सा कानून, कौन-सी सरकारी अधिसूचना, कौन-सा पंजीकरण और कौन-सा न्यायिक निर्णय</strong> है—न कि किसी संस्था की वेबसाइट, प्रचार सामग्री या सामाजिक माध्यमों पर प्रसारित किसी एक पंक्ति से।</p>
<p>और सबसे महत्वपूर्ण बात: <strong>सुभाषिस बक्शी का निर्णय वास्तविक है, सीएमएस से संबंधित न्यायिक इतिहास वास्तविक है, राज्य-विशिष्ट सरकारी रिकॉर्ड भी मौजूद हैं, लेकिन उन सभी को उनके वास्तविक कानूनी संदर्भ में पढ़ना ही इस विषय की सही समझ है।</strong></p>
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<h3>प्रमुख स्रोत और निर्णय</h3>
<ul>
<li><strong>सुभाषिस बक्शी एवं अन्य बनाम पश्चिम बंगाल मेडिकल काउंसिल एवं अन्य</strong>, सर्वोच्च न्यायालय, 14 फरवरी 2003 — सामुदायिक चिकित्सा सेवा की पश्चिम बंगाल वैधानिक व्यवस्था और उपचार/औषधि लिखने के अधिकार का महत्वपूर्ण निर्णय।</li>
<li><strong>डॉ. मुख्तियार चंद एवं अन्य बनाम पंजाब राज्य एवं अन्य</strong>, सर्वोच्च न्यायालय, 8 अक्टूबर 1998 — औषधि एवं प्रसाधन सामग्री नियमों के नियम 2(ईई)(iii), राज्य पंजीकरण और चिकित्सा अभ्यास के संबंध पर महत्वपूर्ण निर्णय।</li>
<li><strong>बहारुल इस्लाम बनाम इंडियन मेडिकल एसोसिएशन</strong>, सर्वोच्च न्यायालय, 24 जनवरी 2023 — आधुनिक चिकित्सा अभ्यास, राज्य पंजीकरण और नियम 2(ईई)(iii) की व्याख्या।</li>
<li><strong>राम कृष्ण पॉल बनाम झारखंड राज्य</strong>, झारखंड हाईकोर्ट, 20 अगस्त 2018 — सीएमएस एवं ईडी धारक द्वारा अभ्यास की अनुमति/अनापत्ति प्रमाणपत्र मांगने का मामला।</li>
<li><strong>संजीव कुमार पाराशर बनाम मध्य प्रदेश राज्य</strong>, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट, 1 दिसंबर 2021 — सीएमएस एवं ईडी प्रमाणपत्र और विशिष्ट औषधि के संबंध में औषधि कानून का मामला।</li>
<li><strong>श्री डॉ. अन्नैया एन. बनाम कर्नाटक राज्य</strong>, कर्नाटक हाईकोर्ट, 20 दिसंबर 2023 — सीएमएस-ईडी और निजी चिकित्सा स्थापना पंजीकरण।</li>
<li><strong>डॉ. वी. मुनुसामी बनाम भारत संघ</strong>, मद्रास हाईकोर्ट, 21 नवंबर 2019 — सीएमएस एवं ईडी और राज्य चिकित्सा स्थापना नियमन से संबंधित विवाद।</li>
<li><strong>धर्मार्थ चिकित्सा सेवा, अमेठी — उत्तर प्रदेश मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय का चिकित्सा स्थापना पंजीकरण प्रमाणपत्र</strong>, 31 मई 2025 — व्यक्ति प्रभारी के रूप में सीएमएस एवं ईडी योग्यता दर्ज।</li>
<li><strong>पंजाब का कुलवंत सिंह मामला</strong> — सीएमएस एवं ईडी प्रमाणपत्र, आवश्यक औषधि सूची तथा उपचार/औषधि लिखने के अधिकार से संबंधित न्यायिक रिकॉर्ड। Order CMS &amp; ED Order CMS &amp; ED</li>
<li><strong>2026 के मद्रास हाईकोर्ट के सीएमएस एवं ईडी मामले</strong> — सीएमएस एवं ईडी से संबंधित वर्तमान न्यायिक विवादों का प्रमाण।</li>
<li><strong>अस्वीकरण:</strong> यह लेख केवल सामान्य शैक्षणिक एवं कानूनी जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें वर्णित न्यायिक निर्णय, सरकारी दस्तावेज और कानूनी प्रावधान संबंधित स्रोतों के आधार पर प्रस्तुत किए गए हैं। CMS &amp; ED की वैधता, पंजीकरण, उपचार, दवा के उपयोग तथा चिकित्सा-प्रैक्टिस की वास्तविक सीमा संबंधित राज्य के लागू कानून, नियम, अधिसूचना, पंजीकरण की शर्तों और सक्षम प्राधिकारी के निर्देशों पर निर्भर कर सकती है। किसी व्यक्ति को इस लेख के आधार पर चिकित्सा-प्रैक्टिस या दवा के उपयोग का स्वतंत्र अधिकार मानकर कार्य नहीं करना चाहिए। किसी विशिष्ट मामले में संबंधित सक्षम प्राधिकारी अथवा विधि विशेषज्ञ से वर्तमान कानूनी स्थिति की पुष्टि करना उचित है। <strong>यह लेख किसी व्यक्ति को डॉक्टर/पंजीकृत चिकित्सक के समकक्ष घोषित नहीं करता और न ही किसी राज्य में सार्वभौमिक प्रैक्टिस-लाइसेंस प्रदान करता है।</strong></li>
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